मदारी का तमाशा
इस बडे से शहर के छोटे से नुक्कड पर मदारी अपना खेल दिखा चुका था, तमाशा देखने वाले जा चुके थे, रोशन (मदारी) जमीन पर पडी चिल्लर बीन रहा था, उसका नौ साल का बेटा आंनद भी भाग-भाग कर इधर उधर पडे सिक्को को ढूंढ रहा था. ‘औह घण्टे भर गले फाडने और रघु की दर्जनो गुलाटियो के बाद इतना भी इकट्टा नही हुआ कि हम भरपेट खाना भी खा सके... कुछ दमड़ी घर ले जाना तो बहुत दूर की बात है’ सिक्को को हाथ मे थामे रोशन ने मन मे सोचा.
‘चल भाई, ये नया जमाना है, मोबाईल के जमाने मे शायद हम और हमारे तमाशे की जरूरत नही है.. चलो कही और चलते है’ रोशन ने कहा और अपना सामान समेटकर आनंद का हाथ थामा और रघु को अपने कंधे पर बैठाकर डुगडुगी बजाता हुआ वह फिर से चल दिया किसी और मौहल्ले मे कुछ आमदमी की उम्मीद मे.
इस गर्मी मे पूरा दिन चार जगह तमाशा दिखाने के बाद भी उसकी जेब लगभग खाली ही थी. आज की आमदनी को देखकर इतनी भी हिम्मत नही हुई की की बाजार से कुछ दाल सब्जी ले सके, क्योकी आज उसे गांव जाकर लाला का उधार भी चुकाना था, कल भी वह कितनी गालिया सुनाकर गया था उसे, जैसे-तैसे उसने आज की मौहलत मांगी थी, आज भी उसे कुछ नही दिया तो पता नही क्या करेगा. इसलिये अपनी उधारी और लाला की गालियो के डर से उसने और आंनद ने घर से लाई रोटियो को प्याज के साथ खाकर अपनी भूख मिटा ली. हां रघु को रोटी के साथ दो सस्ते केले जरूर खिलाये थे.
आज अपनी खाली जेब देखकर उसे पुराने दिनो की याद आ रही थी, जब उसके पिता खेल दिखाते थे, वह और उसके दोनो बडे भाई उनके साथ जाते थे. गली मे डुगडुगी बाजाते ही हर तरफ से भीड उन्हे घेर लेती थी, कैसे गली के लोग तमाशे के बाद भी उसे खाने पीने की चीजे दिया करते थे, कितना सम्मान मिलता था उन लोगो को... जब उनका भालू.... भूरा, ठुमक-ठुमक कर नाच दिखाता, तो हर तरफ ते तालिये का शोर मचता, सिक्को की बरसात होती, कैसे वह और उसके भाई दौड़-दौड़ कर सिक्के इकट्ठे करते थे, भूरा भालू, दो बदंर-बंदरीयो के जोडे, तोता और कालू कुत्ता सब उसके परिवार का ही हिस्सा थे, तब इतने सब होने पर भी कितने आराम से रोटी चलती थी, सब मौज-बहार थी लेकिन फिर धीरे धीरे समय बदला, पहले भालू गया, जंगल विभाग के लोग उसे छुडाकर ले गये. कहते थे की भालू को पालना गैरकानूनी हो गया था. कितना रोये थे उस दिन उसके बापू और अम्मा, लेकिन क्या करे कानून था, अमीर उसका पालन करे ना करे लेकिन गरीब को तो पालन तो करना ही था.. चला गया भूरा...और फिर धीरे- धीरे सब चले गये.. और आज बस एक रघु ही है उसके पास जिसके सहारे वह अपने घर का चूल्हा और अपना पुश्तैनी धन्धा बचाये हुए था.
धंधा पुश्तैनी था, लेकिन इस धन्धे का दौर चला गया था, कभी इतने जानवर इतने बडे परिवार के साथ भी खूब मौज से रहे थे वो लेकिन आज, एक बंदर और घर के चार लोगो का खाना होना भी मुश्किल हो रहा था. उसके बहुत से जानकार साथी यह काम छोड चुके थे, उसके भाई भी फैक्ट्री मे मजदूरी करने लगे थे. उन्होने रोशन को भी समझाया की कुछ नही रखा इस काम मे अब इसे छोडकर मजदूरी करनी शुरू कर दे.. कम से कम खाना-दाना से समय से मिल जाता है, लेकिन रोशन अपने पुरखो का काम छोडना नही चाहता था उसका मानना था की इस तमाशे से ही उनका परिवार चला है, इससे से उनकी पहचान है.. हर धंधे मे नफा नुकसान तो लगा रहता है, इस तरह जरा से खराब समय से हारकर अपना तमाशा बंद नही कर सकता. अपनी इसी सोच के साथ रोशन लगातार इस तमाशे मे लगा हुआ था. पिछले कुछ समय से वह तमाशा दिखना के लिये अपने बेटे को साथ लाता था जैसे उसके बाबा उसे अपने साथ लाते थे, वह सोचता था कि आनंद भी उसका काम सीख लेगा तो उनका पुशतैनी काम आगे भी जिंदा रहेगा.
दिन ढल गया था, हमेशा की तरह किसी सवारी की आस मे वह शहर से गाँव की तरफ जाने वाली सडक पर जाकर बैठ गया, वैसे तो बस वहां से निकल रही थी लेकिन वह सोच रहा था की कोई ट्रैक्टर या टैम्पो मिल जाये तो किराये के पैसे बच जायेगें, अपनी इसी उम्मीद को लेकर वह सडक के किनारे इंतजार कर रहा था. पूरा दिन गला फाडा, लोगो का मनोरंजन करने की कोशिश की, लेकिन लोगो के रूखे व्यवहार और उस कमायी गयी चिल्लर को देखकर वह आज बहुत उदास था. सडक के दूसरी ओर एक मजदूर काम कर रहा था, अपनी आखरी बीडी मे दम भरते हुए रोशन उसे एकटक देख रहा था और सोच रहा था की उसके सब साथी भी मजदूरी करते है, इसी तरह रोज मजदूरी मिल रही है उनको..एक वह है जो मेहनत करके भी खाली हाथ रह जाता है..
उसकी उलझनभरी सोच जब टूटी जब उसने रघु की उछलकूद महसूस की, सडक किनारे के पेडो पर कुछ बंदर खेल रहे थे, उन्हे देखकर रघु भी गुलाटी मार रहा था, बार-बार रस्सी खीचकर उनके साथ खेलने की, उस पेड पर दौडने की असफल कोशिश कर रहा था.
तभी वहां एक स्कूल बस आकर रूकी, स्कूल ड्रेस पहने हुए बच्चे बस से उतरकर खुशी खुशी अपने घरो की तरफ भाग रहे थे, उसका बेटा आनंद अपने चेहरे पर चमक लिये उन्हे देख रहा था, हाथ हिलाकर उन अंजान बच्चो मे घुलने की कोशिश कर रहा था..या शायद कभी उनके जैसा बनने का ख्वाव पाल रहा था..
रोशन कभी पेड़ पर जाकर खेलने की चाहत मे कूदते हुए रघु को देखता तो कभी चेहरे पर मुस्कान लिये हाथ हिलाते आनंद को.....फिर उसने सामने काम करते मजदूर को देखा... और मुस्कुराया..जैसे उसने कोई फैसला कर लिया है.
‘चलो इस बदलते वक्त से साथ अपनी जिंदगी भी बदलते है...’ उसने रघु के गले मे बंधी रस्सी खोल दी और उसे उसके साथीयो के पास जाने दिया, फिर उसने आंनद के सर पर हाथ फेरा और कहा ‘बेटा तू भी कल से स्कूल ड्रेस पहन ले...’
आनंद ने चेहरे पर खुशी लिये अपने बाबा को देखा, तो आजद रघु ने पलट कर अपने मालिक को, उन दोनो की खुशी देककर रोशन भी मुस्कुराया उसने अपना तमाशा दिखाने की पोटली वही छोड दी और सामने काम करते मजूदर मे अपना अक्स देखता हुआ वह पैदल ही अपने रास्ते पर चल दिया. उसके हाथ मे उसके बेटे का हाथ था और चेहरे पर कुछ सूकून.. क्योकी, उसके लिये मदारी का तमाशा खत्म हो गया था.
वह धीरे धीरे अपने रास्ते पर बढता जा रहा था, उसके कदम कभी रूकते कभी चलते, अपनी जिंदगी की परेशानियो से बचने का फैसला लेने की खुशी के बाबजूद भी वह अंदर से बहुत उदास था. उसे लग रहा था की जैसे वह अपना सब कुछ खो चुका है, अपना नाम अपनी पहचान अपने पुरखो की विरासत सबको पीछे छोड चुका है. लेकिन वह अब बहुत आगे आ चुका था, वापस जाना उसके काबू मे नही था, क्योकी रघु अपने दोस्तो के साथ जा चुका था और तमाशा दिखाने की पोटली भी सडक किनारे छोड दी थी. रोशन गुमसुम सा चलता ही जा रहा था, अपने बाबा को गुमसुम देखकर आनंद भी चुपचाप उसकी अंगुली थामे चलता जा रहा था. उसने रोशन से कहा, ‘बाबा मै कल से स्कूल जाऊंगा लेकिन तुम मेरी छुट्टी के दिन से मुझे अपने साथ शहर लाया करोगे तमाशा दिखाने...’ रोशन ने उसे देखा उसके शब्द रोशन को तीर की तरह चुभ रहे थे, लेकिन उसने उससे कहा कुछ नही क्योकी वह अपने बेटे को कैसे बताता की वह तमाशा बदं कर चुका है. अपने इस गम को दिल मे छुपाये हुए वह बिनी कुछ कहे अपनी राह पर आगे बढता रहा तभी सकड किनारे के पेडो से भागता हुआ रघु आया और आकर हमेशा की तरह अपने मालिक के कंधे पर जाकर बैठ गया, शायद वह अपने साथी बंदरो को साथ ज्यादा देर नही रह सका और उसे फिर से अपने मालिक और घर की याद वापस रोशन के पास खींच लायी थी. रघु को देखकर रोशन खुशी से चिल्ला उठा जैसे वह बहुत दिनो बाद अपनी संतान से मिल रहा है. अभी वह रघु से मिलतने की खुशी महसूस कर ही रहा था की दूर से एक आदमी उसे आवाज लागाता हुआ आ रहा था, रोशन ने ध्यान से देखा ये तो वही मजदूर था जो सडक किनारे काम कर रहा था. वह मजदूर रोशन के पास आया और उसने उसकी पोटली उसे थमाते हुए कहा ‘अरे उस्ताद ये पोटली वही भूल आये, क्या बिना डुगडुगी के ही तमाशा दिखाने का इरादा है...’
अपनी पोटली और डुगडुगी थामते हुए रोशन के चेहरे पर ऐसे चमक थी जैसे उसे खोया हुआ खजाना मिल गया हो, उसने मजदूर के हाथ जोड लिये और बोला, ‘भाई बहुत बहुत धन्यवाद, मेरी पहचान मुझे लोटाने के लिये’
‘धन्यवाद की जरूरत नही है मदारी, मै कई बार तुम्हारा तमाशा देख चुका हू और मुझे तुम्हारा तमाशा बहुत पंसद है, मेरी विनती है की अगली बार हमारे मोहल्ले मे भी तमाशा दिखाने जरूर आना, तुम्हारे आने से मोहल्ले मे मेरा भी थोडा रूतवा बढ जायेगा..’
‘अच्छा अभी मुझे जाना है, लेकिन तुम फिर से तमाशा दिखाने आऔगे ना’ मजदूर ने रोशन की आंखो मे देखते हुए कहा.
रोशन ने अपने बेटे के सिर पर हाथ फेरा और आंखे मे आंसु लिये जोर से कहा, ‘हां मेरे दोस्त, अगले रविवार मै और मेरा बेटा तुम्हारे मोहल्ले मे तमाशा दिखाने जरूर आयेंगे....क्योकी मदारी का तमाशा अभी खत्म नही हुआ है, ये तमाशा लगातार चलता रहेगा.
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Writer- Arun Gaud
मो- 821898987
मनीषा अग्रवाल
17-Jan-2022 03:45 PM
बहुत सुंदर कहानी है।
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Arun Gaud
08-Feb-2022 09:31 PM
Thank you Manisha ji👍
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Zeba Islam
17-Jan-2022 11:11 AM
Beautiful story
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Arun Gaud
08-Feb-2022 09:32 PM
Thank you😊
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Seema Priyadarshini sahay
16-Nov-2021 05:10 PM
सुंदर कहानी
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Arun Gaud
08-Feb-2022 09:32 PM
Thank you seema ji😊
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